दो अलग-अलग पार्टियों के रणनीतिकार और दो अलग अलग राज्य, क्या अपनी अपनी पार्टियों को जीत दिला पाएंगे ?
चुनावी मौसम में, "चाणक्य " का नाम उभरने लगता है, खासकर जब कोई पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आती है तब चुनावी समीक्षक जीत का तमगा किसी विशेष नेता को देती है जिसे राजनीतिक भाषा में चाणक्य बोला जाता है, लेकिन जब कोई पार्टी चुनाव हारती है तब हार का तमगा या तो लगाया नहीं जाता या फिर चाणक्य को विशेष दलीलें देखकर बचा लिया जाता है !
इस समय देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव चल रहे हैं और इन पांच राज्यों में से असम और पश्चिम बंगाल दो राज्य ऐसे हैं जिन पर सारे देश की निगाह है !. राजनीति में निगाह, "नींव के पत्थर पर नहीं डाली जाती उसके कंगार पर डाली जाती है "
जिस पत्थर के कारण बिल्डिंग बनी है उस पत्थर को कम ही निहारा जाता है क्योंकि वह जमीन के अंदर दफन होकर रह जाता है यह उसकी नियति है या फिर मजबूरी !
असम में कांग्रेस और पश्चिम बंगाल में भाजपा जिस जीत के लिए लालायित है उसकी आधारशिला रखने वाले असम में कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और असम प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह हैं वही पश्चिम बंगाल में भा. ज. पा. के राष्ट्रीय नेता कैलाश विजयवर्गीय हैं जो लंबे समय से असम और पश्चिम बंगाल में मेहनत कर अपनी-अपनी पार्टियों की सरकार लाने का कार्य कर रहे हैं !
असम में भाजपा की सरकार थी जबकि पश्चिम बंगाल T.M.C. की सरकार है !
असम में कांग्रेस वापसी करने के लिए प्रयास कर रही है वही बंगाल में भा ज पा पहली बार अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर रही है !
पश्चिम बंगाल और असम दोनों ही राज्यों में कैलाश विजयवर्गीय और भंवर जितेंद्र सिंह का अपना अपना महत्व है दोनों ही ऐसे राज्य हैं जहां बाहरी मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं असम में मारवाड़ी राजस्थानी मतदाताओं की बड़ी संख्या है और असम में बड़ी संख्या में राजस्थान का व्यापारी वर्ग मौजूद थे.
भंवर जितेंद्र सिंह राजस्थान के अलवर राजघराने से आते हैं इसलिए असम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है इसी तरह बंगाल में हिंदी भाषी मतदाताओं की तादाद भी कम नहीं है इसलिए वहां कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका महत्वपूर्ण है, पश्चिम बंगाल में भा जा पा की हवा बनाने में कैलाश विजयवर्गीय की मेहनत और भूमिका अहम है वही असम में भंवर जितेंद्र सिंह की भूमि का महत्व है अब देखना यह होगा कि यह दोनों युवा नेता अपने-अपने राज्यों में सफल हो पाते हैं या नहीं और यदि सफल होते हैं तो इस जीत का तमगा किस नेता के माथे पर सजेगा इसका इंतजार करना होगा !
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देवेंद्र यादव |
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