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Monday, April 19, 2021

4/19/2021 10:22:00 PM

महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में लोकडाउन लगा, बाकी राज्यों में क्यों नहीं ?

क्या अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होना, देश का दुर्भाग्य है ?


कोविड-19 ने, प्रारंभ से लेकर 2021 तक देश की जनता को अनेक सबब सिखाएं जिसमें एक सबब यह भी सिखाया और सवाल उठाया की क्या देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होना, जनता का दुर्भाग्य है ? यदि कोरोना महामारी  के पहले चरण से लेकर दूसरे चरण पर बात करें तो, जो बात राजनेता पहले चरण में कर रहे थे वही बात दूसरे चरण में भी सुनाई दे रही है ! पहले चरण में और दूसरे चरण में कुछ नहीं बदला बदला है तो सिर्फ कोरोना महामारी पीड़ितों और मरने वाले लोगों की संख्या में बदलाव देखने को मिला है ! कॉविड 19 के पहले चरण की ही तरह दूसरे चरण में भी, पक्ष विपक्ष के नेता अपनी पार्टी की सरकार बनवाने के लिए मैदान में नजर आ रहे हैं, सिर्फ पहले चरण में और दूसरे चरण में फर्क इतना आया है कि पहले चरण में राजनीतिक पार्टियां अपनी सरकार को बचाने और गिरा  कर बनाने में लगे हुए थे और दूसरे चरण में चुनावी सभाएं करके अपनी सरकार बनाने के लिए लगे हुए हैं ! जनता ने नेताओं  पर  जनता के प्रति नेताओं की प्राथमिकता और जिम्मेदारी क्या हो यह सवाल पहले चरण में भी उठाया था और यह सवाल दूसरे चरण में भी सुनाई दे रहा है,  जनता के सवालों का जवाब एक ही वाक्य पर आकर अटक जाता है और वह वाक्य क्या अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होना है क्या ?

 कोरोना महामारी के दौर में एक शब्द राजनीति करने का भी तेजी से पक्ष विपक्ष के नेताओं के बीच से निकलता हुआ सुनाई दीया, राजनीति करने जैसे शब्द का उदय भी इसलिए ही हुआ है क्योंकि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें हैं ! और अलग-अलग राज्यों मैं अलग-अलग पार्टियों की सत्ता पर काबिज नेता एक दूसरे की कमजोरियां बता कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए रास्ता तलाशते हैं ,और एक दूसरे पर इसका ठीकरा  फोड़ते हैं ?  और इसे ही नेताओं की भाषा में राजनीति करना कहते हैं! केंद्र में एक दल की प्रचंड बहुमत की सरकार है मगर राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं ! कोरोना महामारी एक दल की सरकार और बहू दल वाली राज्य सरकारों के बीच  अपने आप को शायद सुरक्षित महसूस कर रहा है? 

 केंद्र के सत्ताधारी और राज्यों के सत्ताधारी एक दूसरे पर बद इंतजा मियां पर जनता के सवालों का जवाब एक दूसरे पर डोलते हुए नजर आते हैं ! वैक्सीन इंजेक्शन ऑक्सीजन बेड या फिर अन्य जरूरी चीजें, केंद्र और राज्य की सत्ता पर बैठे नेता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते नजर आते हैं !  विपक्ष की नेता श्रीमती सोनिया गांधी केंद्र सरकार पर आरोप लगाती है कि केंद्र की भाजपा सरकार गैर भाजपा सरकारों को कॉर्पोरेट नहीं कर रही है जबकि केंद्र सरकार के नुमाइंदे आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार अपना काम बखूबी से कर रहा है लेकिन राज्य सरकार अपना काम ठीक से नहीं कर रही हैं,  इसी कशमकश के बीच यह सवाल उठता है कि क्या अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होना दुर्भाग्य है,  और क्या कोरोना महामारी की जंग में एक रोडा है ! यह हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है कि जनता किसे चुने और किसे ना चुने यही तो जनता के पास संवैधानिक अधिकार है !


सरकारें तो पहले भी ऊपर से नीचे कई बार किसी एक दल की नहीं रही और ऐसा भी नहीं है की उस दौर में महामारी  भी नहीं आई  हो,  पोलियो मलेरिया खसरा जेसी बीमारियां का दौर भी देश ने देखा है , जब मलेरिया और पोलियो उन्मूलन राष्ट्रीय उन्मूलन अभियान बना !और  केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर इस अभियान को सफल बनाया मलेरिया का टेस्ट कर मलेरिया की दवाइयां वितरित की,  राष्ट्रव्यापी पोलियो अभियान तो देश में अभी तक चल रहा है स्वास्थ्य कर्मी घर घर जाकर बच्चों को पोलियो की दवाई पिलाते हुए नजर आते हैं ! मलेरिया और खसरा की बीमारी के समय देश के पास इतने अधिक संसाधन और पैसा भी नहीं था जितने संसाधन और पैसा आज है ! एक मलेरिया इंस्पेक्टर के ई गांव में साइकिल या पैदल जा कर घर घर से मलेरिया टेस्ट कर आता था और सही इंस्पेक्टर पीड़ित लोगों को घर घर जाकर मलेरिया की दवाइयां दे आता था !  मलेरिया से बचाव के लिए घर-घर में डीडीटी का छिड़काव किया जाता था,  उस दौर में ना तो जनता की सरकार के प्रति नाराजगी दिखाई देती थी और ना ही राजनेताओं में वाद विवाद क्योंकि लक्ष्य सबका एक था की बीमारी से देश को कैसे बचाया जाए!

 क्या फर्क है उस दौर मैं और आज के दौर की सरकारों में यह सवाल मैं जनता पर छोड़ता हूं?

Devendra Yadav
Sr. Journalist & Political Analytics



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