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Wednesday, June 9, 2021

6/09/2021 10:20:00 AM

जैसे तिल में तेल है जयों चकमक में आग ।

तेरा साई तुझ में हे जाग सके तो जाग ।।

15 वी सदी के क्रांतिकारी संत

सदगुरु कबीर साहब की बात ही मान लेते कि तेरा सांई तुझ में ही है ,अपनी ही काया के भीतर सत्य है , जिसे आप सांई कहो ,साहेब कहो या ओर कुछ नामकरण कर दो , लेकिन बहुजन विचार यह करो कि अपनी की काया के भीतर सत्य है ,तो सोचो आप उसकी मूर्ति कैसे बना सकते हैं? 

आप की काया के भीतर ही सत्य है तो आप उसकी पूजा पाठ कर्मकांड यज्ञ हवन कैसे कर सकते हैं? 

किसकी आरती ओर कोन आरती कर रहा है ।

आरती करने वाले की काया के भीतर भी सत्य है ।

तो यह पूजा पाठ कर्मकांड यज्ञ हवन आदि किसके लिए ?

शरीर के भीतर ही है तो शरीर के भीतर ही तलाश करो ।

ओर तलाश भी क्या करनी है? 

अपनी काया के भीतर जरा विश्राम करो ,तनिक ठहरो ओर कैसे ठहरोगे यही बात महत्वपूर्ण है ।

बुद्ध ने भी सांसों को देखकर ही आनापान साधना सीखायी ओर वही पद्धति सद्गुरु कबीर साहब ने भी समझा दी है ।

पूरी विद्या सीखने के लिए विपश्यना सेंटर पर जाकर विपश्यना करें और तब नहीं जाते हैं आनापान साधना घर पर ही करते रहे ।

हो जाओ आजाद पाखंडवाद से पहले खुद ओर खुद का परिवार आजाद बनें । इस आजादी को हासिल करो और कुछ लोग आप को देखकर बदल जायेंगे ।

तिल के अंदर ही तेल है यानि आपके शरीर के भीतर ही सत्य है जिसे आप सब ईश्वर अल्लाह राम खुदा वाहेगुरु ईशु आदि अनेक नामों से पुकारते हैं लेकिन उसका कोई नाम नहीं है ।

  वो केवल अनुभव का विषय है , परम सत्य चेतना के प्रवाह को देखने के लिए खुद के प्राणों की प्यास चाहिए और जब तक यह प्यास न जागे तब तक पाखंडी मत बनो ।

 ( उपासिका राजेश शाक्य लेक्चरर जिला कोटा राजस्थान)

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