किसान अपने आंदोलन को महंगाई का विरोध कर जन आंदोलन बनाएंगे क्या ?
-Devendra Yadav-
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों ने 8 जुलाई गुरुवार को देश में बढ़ती महंगाई के खिलाफ सरकार की नीतियों का विरोध किया ?
किसानों के अचानक किए गए महंगाई के खिलाफ विरोध ने सवाल खड़ा कर दिया की क्या किसान अपनी समस्याओं के साथ साथ जनता की समस्याओं को भी उठाकर और समस्याओं का विरोध कर अपने किसान आंदोलन को जन आंदोलन में बदल कर सरकार के खिलाफ अपने आंदोलन को और अधिक धारदार बनाएंगे क्या ? किसानों का महंगाई को लेकर विरोध प्रदर्शन से तो कुछ ऐसा ही लग रहा है! यह आशंका मैंने अपने पुराने ब्लॉक में भी व्यक्त की थी की यदि केंद्र सरकार ने किसान आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया तो किसान आंदोलन धीरे धीरे जन आंदोलन में तब्दील होता हुआ चला जाएगा, जिसकी एक झलक 8 जुलाई को दिल्ली के तीनों बॉर्डर पर देखने को मिली जहां किसानों ने बड़ी संख्या में महंगाई को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध किया ! कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसान नेताओं से महंगाई के खिलाफ विरोध करने पर पत्रकारों ने सवाल किया तो किसान नेता राकेश टिकैत ने स्पष्ट जवाब दिया कि महंगाई की मार किसानों पर भी पढ़ रही है किसान कृषि कानूनों के कारण भविष्य के संकट को तो देख ही रहा है लेकिन वर्तमान संकट किसान के सामने डीजल पेट्रोल रसोई गैस बिजली खाद्य तेल की कीमतों में वृद्धि जैसा संकट आ गया है, किसान को ट्रैक्टर चलाने के लिए और खेत में पानी देने के लिए डीजल की आवश्यकता पड़ती है और डीजल की सरकार लगातार कीमतें बढ़ा रही है इससे किसानों को अतिरिक्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है ?
महंगाई से त्रस्त जनता भले ही किसानों के साथ धरने पर नहीं बेटे लेकिन बाहर से जनता का समर्थन किसानों को मिल सकता है ! यदि डीजल और पेट्रोल के दाम इसी तरह से बढ़ते रहे तो परिवहन का काम करने वाले निजी वाहन मालिक भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर आ सकते हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता ?
अब भाजपा सरकार के सामने चुनौती पांच राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनाव हैं ! कहने को तो चुनावों के मद्देनजर रखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल का पुनर्गठन कर लिया है जिसमें क्षेत्रीय और जातीय आधार पर प्रतिनिधित्व दिया है, लेकिन महंगाई को लेकर जनता के आक्रोश और कृषि बिलों को लेकर किसानों के आक्रोश की चुनौती से भाजपा सरकार कैसे नि प टै गी यह सबसे बड़ा सवाल है ! गत दिनों संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार को किसान अपने आंदोलन की सबसे बड़ी जीत मानकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मैं संपन्न होने वाले विधानसभा चुनाव मैं पश्चिम बंगाल की तर्ज पर भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करने की तैयारी कर रहे हैं इस चुनाव में किसानों की तैयारी अपनी समस्याओं को लेकर ही नहीं है बल्कि वह चुनाव में जनता की महंगाई वाली समस्या और बेरोजगार युवाओं की रोजगार वाली समस्या को भी उठाएंगे ?
महंगाई को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल रखा है !
कांग्रेस के महंगाई के खिलाफ 7 जुलाई से 17 जुलाई तक देशभर में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं !
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों मैं भा जा पा पर महंगाई का कितना असर होता है, इस पर नजर रहेगी लेकिन सबसे बड़ी नजर आंदोलनकारी किसानों पर रहेगी की वह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मैं भाजपा के खिलाफ प्रचार कर कितनी क्षति पहुंचाते हैं ! भाजपा के रणनीतिकार सार्वजनिक रूप से ना सही लेकिन अंदर खाने वह भी किसानों की इस रणनीति को गंभीरता से ले रहे हैं और शायद इसीलिए देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक बार फिर से किसानों से बात करने को कहा है! किसान नेताओं ने तोमर के संभावित बात करने के प्रस्ताव पर कहा कि सरकार यदि बगैर शर्त रखे बात करना चाहती है तो किसान बात करने को तैयार है ! लगता है किसानों की समस्या को लेकर सरकार गंभीर नजर आ रही है, क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं किसानों से बात करेंगे और किसानों की समस्या का निराकरण कर देंगे ?
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Devendra Yadav Sr. Journalist |
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