कांग्रेस: क्या राज्यों में जातिगत कद्दावर नेताओं का अभाव है ?
--Devendra Yadav--
कांग्रेस के नेता अक्सर यह कहते हुए दिखाई देते हैं कि कांग्रेस 36 कोम की पार्टी है, मगर क्या देश के विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के पास मौजूदा समय में 36 कोम के मजबूत कद्दावर नेता है क्या ? जो कांग्रेस को विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जीत दिलवा सके ? यह बड़ा सवाल है जिस पर कॉन्ग्रेस को अधिक मंथन करने की जरूरत है ? देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दल क्यों बने और क्षेत्रीय दल क्यों पनपे और क्षेत्रीय दलों ने देश की किस पार्टी को सबसे अधिक वोटों का नुकसान किया !
यदि हिंदी भाषी प्रदेशों की बात करें तो इन राज्यों में ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां दलित आदिवासी और पिछड़ी जाति के नेताओं ने जातिगत आधार पर खड़ी की ! आजादी के बाद से लेकर क्षेत्रीय दल बनने से पहले तक दलित आदिवासी और पिछड़ी जाति का वोट कांग्रेस का अपना एक मजबूत पारंपरिक वोट था, जो जातिगत क्षेत्रीय दल बनने के कारण कांग्रेस से खिसक कर दूर हो गया ! इसके पीछे एक कारण यह रहा है कि कांग्रेस के पास मजबूत कद्दावर जातिगत नेताओं का अभाव दिखाई देने लगा ! कांग्रेस के पास दलितों में बाबू जगजीवन राम जैसा बड़ा चेहरा था, बाबू जगजीवन राम के साथ साथ राज्य में जगन्नाथ पहाड़िया चांदराम बुध प्रिय मौर्य जैसे नेता भी थे ! माधव सिंह सोलंकी अमर सिंह चौधरी भीखाभाई जैसे आदिवासी मजबूत नेता भी कांग्रेस के पास थे ! बंसीलाल भजनलाल रामनिवास मिर्धा नाथूराम मिर्धा परसराम मदेरणा राम नरेश यादव बलीराम भगत जैसे पिछड़ी जाति के कद्दावर नेता भी थे, यह वह नेता थे जो अपनी जाति के मतदाताओं को कांग्रेस के साथ जोड़ कर रखते थे, लेकिन इन नेताओं के बाद कांग्रेस जातिगत नेताओं की मजबूत टीम खड़ा करने मैं सफल नहीं हो पाई, इसकी खास वजह यह रही कि कांग्रेस ने कद्दावर नेताओं के बाद उन नेताओं का substitute उन लोगों को चुनाव जो जातिगत कद्दावर नेताओं के सगे संबंधी थे!
परिवार से अलग निकलकर कांग्रेस कोई भी बड़ा नेता खड़ा नहीं कर पाई, जिसका परिणाम यह रहा कि राज्यों के भीतर जातिगत उभरते हुए नेताओं ने अपने अपने क्षेत्रीय दल बनाने शुरू कर दिए !
बहुजन समाज पार्टी, आरजेडी , वीआईपी जैसे अनेक ऐसे क्षेत्रीय दल है जिनके कारण कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा ! इन क्षेत्रीय दलों के कारण कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार में दशकों से सत्ता से बाहर है ! कांग्रेस ने परिवार से ऊपर उठकर जिन राज्यों में नेता पैदा किए उन राज्यों में कांग्रेस आज भी सत्ता में है जिसका उदाहरण राजस्थान है जहां अशोक गहलोत तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री है ! कांग्रेस के पास दलित आदिवासी पिछड़ी जाति के कद्दावर नेताओं का अभाव ही नहीं है बल्कि ब्राह्मण और अल्पसंख्यक बनिया जैसे अन्य समाजों के कद्दावर नेताओं का भी अभाव है और उसकी वजह भी यह है कि कांग्रेस ने इनका भी change कद्दावर नेताओं के परिवार वालों को ही चुना जिन्हें क्षेत्र की जनता ने स्वीकार नहीं किया और नहीं कर रही है !
इन दिनों कॉन्ग्रेस में भारी बदलाव होने की चर्चा होती सुनाई दे रही है ! देश के अनेक राज्यों में कांग्रेस के भीतर आंतरिक कलह चल रहा है ! राजस्थान और पंजाब में आंतरिक विवाद कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा है !
दोनों ही राज्यों मैं लगभग एक जैसी परिस्थिति है और समाधान भी लगभग एक जैसा है !
राजस्थान में मुख्यमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष दोनों बड़े पद पिछड़ी जाति के नेताओं के पास हैं और पंजाब में भी मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का पद Sikh समुदाय के पास हैं ! जबकि इन राज्यों में प्रतिशत को आधार मानकर देखे तो अन्य जातियां इनसे बड़ी हैं, मगर दोनों प्रमुख पदों में से एक भी पद उन जातियों के पास नहीं है ! पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस का प्रमुख अध्यक्ष बनाया है और साथ में 4 कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए हैं क्या कार्यकारी अध्यक्ष बनाने से वह जातियां संतुष्ट हो जाएंगी जो जातियां लंबे समय से बड़ी जिम्मेदारी मिलने का इंतजार कर रही है ! राजस्थान में भी कुछ ऐसा ही नजारा है यहां भी पिछड़ी जाति के नेताओं के पास मुख्यमंत्री और कांग्रेस के अध्यक्ष का पद है जबकि दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक ब्राह्मण जाति के नेता भी प्रदेश में मजबूत स्थिति में हैं मगर उनके पास दोनों में से एक भी बड़ी जिम्मेदारी नहीं है !
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Devendra Yadav Sr Journalist |
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