विपक्षी एकता के चुनावी फार्मूले से क्या कांग्रेस को फायदा होगा ?
Devendra Yadav
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी की दिल्ली यात्रा और अपनी यात्रा के दौरान विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मेरा थन मुलाकात ने एक बार फिर से देश की राजनीति को विपक्षी एकता के नाम पर गर्म कर दिया है ! मुलाकातों का दौर इतनी तेजी से हुआ कि लगने लगा की समझो मुलाकात के दौर में ही विपक्षी दल एक होकर भाजपा सरकार के खिलाफ मैदान में उतर गए हो लेकिन संसद में पेगासस जासूसी मामले को लेकर भाजपा सरकार को घेरने के लिए रणनीति बना रहे विपक्ष के बीच से विपक्षी एकता के लिए मैराथन मुलाकात कर रही ममता बनर्जी की पार्टी ही नदारद थी ! 28 जुलाई को जहां एक तरफ ममता बनर्जी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के साथ मुलाकात कर रही थी वही दूसरी तरफ कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी संसद के भीतर पेगासस जासूसी मामले को लेकर 17 विपक्षी पार्टियों के साथ भाजपा सरकार को संसद में घेरने की रणनीति बनाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे मजेदार बात यह है जो राजनैतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना वह यह था कि संसद के भीतर तमाम विपक्षी दल भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति बना रहे थे लेकिन उस रणनीति का हिस्सा तृणमूल कांग्रेस नहीं थी उसका एक भी सांसद विपक्ष की बैठक मैं नहीं था !
ममता बनर्जी के विपक्षी एकता के प्रयास और कयास इस घटना के बाद दिन भर राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बने रहे ! 28 जुलाई 2021 के दिन को राजनैतिक दृष्टि से आकलन करें तो, यह दिन स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि विपक्ष को एकजुट करने के लिए किस नेता में दम है ममता बनर्जी में या फिर राहुल गांधी में और राहुल गांधी ने 28 जुलाई को राजनीतिक पंडितों को अपनी दम दिखा दी जब एक तरफ ममता बनर्जी विपक्षी एकता के लिए विपक्षी नेताओं से मिलने के लिए मेराथन मुलाकात कर रही थी वही दूसरी तरफ राहुल गांधी संसद के भीतर 17 विपक्षी पार्टियों के साथ भाजपा सरकार के खिलाफ रणनीति बना रहे थे !
ममता बनर्जी विपक्षी एकता के मुलाकातें कर प्रयास कर रही थी वही राहुल गांधी ने विपक्ष को एकजुट कर सरकार को घेरने की रणनीति बना ली ! मतलब साफ है राजनीतिक रूप से भारी कौन राहुल या ममता ?
विपक्षी एकता की सुर्ख़ियों के बीच एक बात यह भी सुनाई दी की 2024 के आम चुनाव में विपक्ष को एकजुट करने वाले नेता इस चुनाव को "मोदी वर्सेस गांधी "नहीं बनने देंगे ? इससे स्पष्ट हो जाता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी और गांधी दोनों का विरोध होगा ? यदि ऐसा हे तो फिर विपक्षी एकता के नाम पर सोनिया गांधी के साथ बैठक करने का औचित्य ही क्या है, और फिर विपक्षी एकता की शायद जरूरत भी नहीं है, क्योंकि मोदी का मतलब भाजपा और गांधी का मतलब कांग्रेस है और दोनों को वर्सेस नहीं बनने देना है ऐसे में विपक्षी एकता के मायने क्या है ? लेकिन विपक्षी एकता के लिए जुटे नेता अंदर खाने यह तो महसूस कर रहे हैं कि मोदी का विकल्प गांधी ही है और भाजपा का विकल्प कांग्रेस ही है यदि ऐसा नहीं होता तो शायद राजनीतिक गलियारों में मोदी वर्सेज गांधी शब्द निकल कर नहीं आता !
भा जा पा इस वक्त देश में चल रही अनेक समस्याओं को लेकर घिरि हुई है, कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी लगातार सड़क से लेकर संसद तक भाजपा सरकार को अनेक मुद्दों पर घेरने में लगे हुए हैं ! मौजूदा वक्त में भा जा पा राजनीतिक तौर पर कमजोर भी दिखाई दे रही है
ऐसे में जनता की नजर कांग्रेस की तरफ इनायत हुई है क्योंकि कांग्रेस विभिन्न मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार के खिलाफ लगातार अपनी आवाज उठा रही है, ! लेकिन विपक्षी एकता का अभियान कांग्रेस को कमजोर करता हुआ दिखाई दे रहा है तो वही भाजपा मजबूत होती हुई दिखाई दे रही है ? क्योंकि भा जा पा को शायद विपक्षी एकता सूट करती है जनता को समझाने के लिए की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले एक तरफ देश की समस्याओं के लिए चिंतित हैं वही दूसरी तरफ सारे विपक्षी दल अकेले नरेंद्र मोदी के पीछे पड़े हुए हैं उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं !
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Devendra Yadav Sr. Journalist |
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