तीसरा मोर्चा भाजपा के खिलाफ बनेगा या फिर एनडीए के खिलाफ होगा ?
Devendra Yadav
देश के राजनीतिक गलियारों में तीसरा मोर्चा और विपक्षी एकता को लेकर बड़ी चर्चा हो रही है !
अधिक चर्चा यह हो रही है कि 2024 के चुनाव में भाजपा को हराने के लिए सारा विपक्ष एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ तीसरा मोर्चा बनाएं !
मगर सवाल यह है जिस पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा नहीं हो रही है, सवाल यह है कि तीसरा मोर्चा भाजपा के खिलाफ बनेगा या एनडीए के खिलाफ बनेगा ? "" सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा के खिलाफ तीसरा मोर्चा में कांग्रेस शामिल होगी या नहीं और विपक्षी एकता का प्रयास करने वाले नेता एनडीए को तोड़ पाएंगे या नहीं और क्या कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता और तीसरा मोर्चा बनना संभव है और क्या एनडीए को तोड़े बगैर भाजपा को हराना संभव है ?
क्योंकि चर्चा इस बात को लेकर हो रही है की भा ज पा के खिलाफ सारे क्षेत्रीय दल एकजुट हो जाएं, विपक्ष की एकजुटता भा जा पा को 2024 में हरा देगी ?
लेकिन चर्चा इस बात पर नहीं हो रही है कि भाजपा अकेले केंद्र की सत्ता को नहीं चला रही है उसमें क्षेत्रीय दल भी शामिल हैं जो भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं ! भाजपा ने 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव अनेक क्षेत्रीय दलों से चुनावी गठबंधन कर लड़ा था भाजपा उस एनडीए गठबंधन के कारण केंद्र की सत्ता पर काबिल हुई थी !
2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में स्वयं भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था इसके बाद भी भाजपा ने गठबंधन का धर्म निभाया और अपने साथी दलों को केंद्र सरकार में शामिल रखा !
भाजपा गठबंधन की राजनीति 2014 से ही नहीं कर रही है बल्कि भाजपा अटल बिहारी युग से गठबंधन की राजनीति कर रही है ! भाजपा नीत गठबंधन और विपक्ष की एकता के नाम पर बनने वाले तीसरा मोर्चा मैं एक बड़ा फर्क भी है फर्क यह है की एनडीए गठबंधन में जातीय आधार के क्षेत्रीय दल अधिक हैं यह दल भले ही सीटों के आधार पर छोटे-छोटे दल हैं मगर वोटों के आधार पर यह बड़े दल हैं जो किसी भी पार्टी के उम्मीदवार को हराने की दम रखते हैं, इन्हीं छोटे-छोटे दलों के कारण कांग्रेस आज सत्ता से बाहर है और भाजपा सत्ता में है, क्योंकि अधिकांश क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जो एक समय कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता था लेकिन उस वोट बैंक से वोटर नेता के रूप में निकले और उन्होंने अपना अलग क्षेत्रीय दल बनाया, जिन्हें भाजपा के रणनीतिकारों ने समझा और पकड़ा और उनके साथ चुनावी गठबंधन किया और भाजपा केंद्र की सत्ता तक पहुंची !
विपक्ष की एकता और तीसरा मोर्चा खड़ा करने की वकालत करने वाले शरद पवार सुश्री ममता बनर्जी के पास भी राजनैतिक जमीन कांग्रेस की ही है, इन दोनों नेताओं ने भी कांग्रेस से अलग होकर अपने अपने राजनीतिक दल बनाए और दोनों ने ही कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी की और अपने-अपने राज्यों में प्रभावशाली नेता के रूप में निकल कर आए ! तृणमूल कांग्रेस निश्चित रूप से पश्चिम बंगाल में लगातार तीसरी बार जीती है लेकिन उसके पास जो वोट बैंक है वह वोट बैंक कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक ही है क्योंकि भा ज पा ने हारने के बाद भी पश्चिम बंगाल में लगभग 75 सीटें लेकर अपना दम दिखाया है भाजपा की पश्चिम बंगाल से लोकसभा में भी 18 सीटें हैं इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में भा जा पा कमजोर है भाजपा ने 2021 के विधानसभा चुनाव में लड़ाई लड़ी और पहली बार बंगाल में 75 सीट जीतकर अपना दम दिखाया ! जब बात विपक्षी एकता और भा जा पा को हराने की हो रही है तो चर्चा 2004 के लोकसभा चुनाव पर भी होनी चाहिए, 2004 में भा जा पा नीत गठबंधन मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था एक तरफ कॉन्ग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी तो वही दूसरी तरफ ममता बनर्जी की पार्टी और एनसीपी भी अलग से चुनाव लड़ रही थी और इस चुनाव में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर दिखाया था बाद में सरकार के गठन के लिए यूपीए गठबंधन बनाया गया !
2004 में भाजपा को हराने में विपक्ष एकजुट नहीं था बल्कि अलग-अलग चुनाव लड़े थे और विपक्ष ने उस चुनाव में भा जा पा को हराया था ! जबकि 2004 में कांग्रेस की आंतरिक स्थिति आज से भी ज्यादा खराब थी कांग्रेस के पास कोई मजबूत नेता नहीं था अकेले सोनिया गांधी बड़ी नेता थी ! जबकि मौजूदा वक्त में कांग्रेस के पास पहले से ज्यादा नेता मौजूद हैं और परिस्थितियां भी अनुकूल हैं, 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ विपक्ष के पास मजबूत मुद्दे भी नहीं थे, जबकि आज विपक्ष के पास भा जा पा के खिलाफ मजबूत मुद्दे हैं, और उन मुद्दों को लेकर कांग्रेस भाजपा सरकार को निरंतर चुनौती दे रही है रही है ! 2004 के स्मरण को याद करें तो क्या कांग्रेस विपक्षी एकता के नाम पर 2024 के लिए बनाए जा रहे फार्मूले को स्वीकार कर लेगी और क्या कांग्रेश के 200 सीटों पर ही चुनाव लड़ लेगी!
जहां तक भा जा पा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर की बात करें तो मध्य प्रदेश राजस्थान छत्तीसगढ़ गुजरात जैसे बड़े राज्यों में कॉन्ग्रेस भा जा पा के सामने बुरी तरह से हारी है ऐसे में कॉन्ग्रेस केवल भा जा पा से सीधी टक्कर वाली सीटों को लेकर क्या संतुष्ट हो जाएगी यह अभी देखने वाला विषय है अभी इंतजार करना होगा क्योंकि लोकसभा चुनाव होने में अभी समय बाकी है इससे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा और राष्ट्रपति का चुनाव होना है क्या विपक्ष इन दोनों चुनाव में अपनी एकता का परिचय देगा इसके बाद ही तय होगा कि विपक्ष की एकता बातें करने में कितना दम है ।
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Devendra Yadav Sr. Journalist |
Nice
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