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Monday, July 5, 2021

7/05/2021 08:47:00 AM

क्या कॉन्ग्रेस के पास असम मैं असफल होने के बाद उत्तराखंड में सफल होने का अवसर है ?



-Devendra Yadav-

अक्सर देखा गया है कि कॉन्ग्रेस अपने हाथ में आए हुए राजनीतिक अवसरों को भु ना ने  में ऐन वक्त पर ना काम हो जाती है ? गत दिनों देश ने यह नजारा असम विधानसभा के चुनाव के समय देखा था ! जहां कांग्रेस के रणनीतिकार ईमानदारी के साथ प्रयास करते तो, यदि कांग्रेस हेमंत विश्व शर्मा की भा जा पा में चल रही अपनी नाराजगी पर ध्यान देती तो, शायद असम में आज नजारा कुछ और ही होता, कांग्रेस ने हेमंत विश्व शर्मा की नाराजगी पर कम और बदरुद्दीन से चुनावी समझौता करने पर अधिक ध्यान दिया ! जिसका कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा !

असम और उत्तराखंड की राजनीतिक तुलना कांग्रेस के परिप्रेक्ष्य में करें तो दोनों में लगभग एक जैसी समानता दिखाई देगी ! असम में कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर असम के कद्दावर नेता हेमंत विश्व शर्मा की नाराजगी थी और कांग्रेस हाईकमान हेमंत विश्व शर्मा की नाराजगी को समय रहते हुए दूर नहीं कर पाई, परिणाम यह हुआ कि हेमंत विश्व शर्मा ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया और उस समय जब विधानसभा के चुनाव हुए तब कांग्रेस चुनाव हार गई और असम में पहली बार भाजपा ने अपनी सरकार बनाई ! 

हेमंत विश्व शर्मा की नेतृत्व को लेकर नाराजगी भाजपा के अंदर भी चलती रही और जब 2021 के विधानसभा चुनाव हुए तब यह नाराजगी और अधिक बढ़ती हुई दिखाई दी कांग्रेस के लिए यह अवसर था जब वह हेमंत विश्व शर्मा की कांग्रेस में वापसी करा सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया ! जबकि भा जा पा हेमंत विश्व शर्मा की नाराजगी को समझ गई थी और उसने मुख्यमंत्री सोनवाल के नेतृत्व में चुनाव नहीं लड़ा भाजपा ने बगैर चेहरे के असम में चुनाव लड़ा और जब भा जा पा असम में चुनाव जीती तब उसने अपना मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा को बनाया !

अब असम के जैसी परिस्थितियां भाजपा के लिए उत्तराखंड में भी बनती दिखाई दे रही है, और कांग्रेस के पास अवसर बन रहा है !

उत्तराखंड में इस समय कांग्रेस सत्ता से बाहर है इसका एक मुख्य कारण उत्तराखंड के कद्दावर नेता सतपाल महाराज हैं जिन्होंने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था, सतपाल महाराज उम्मीद कर रहे थे, की भाजपा उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाएगी, लेकिन तीन मुख्यमंत्री बदले जाने के बाद भी सतपाल महाराज का नंबर नहीं आया ! जिस उम्मीद के साथ सतपाल महाराज कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे ,वह उम्मीद महाराज की टूट गई क्योंकि भाजपा ने तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटाकर पुष्कर सिंह धामी को नया मुख्यमंत्री बना है जबकि मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत थे ! 


क्या कांग्रेस 6 महीने बाद उत्तराखंड विधानसभा के होने वाले चुनाव से पहले सतपाल महाराज की कांग्रेस में वापसी करवा पाएगी या असम के जैसे ही नाकामी का ताज पहनकर अपनी किस्मत का इंतजार का इंतजार करेगी !

उत्तराखंड में कांग्रेस के पास मजबूत नेता के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत मौजूद हैं लेकिन भा ज पा ने पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बना कर हरीश रावत के सामने एक ठोस चुनौती पेश कर दी है क्योंकि यह दोनों ही नेता उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र से आते हैं ! उत्तराखंड में कांग्रेस को सफल होना है तो उसे अभी से सतपाल महाराज जैसे अनेक अपने पूर्व नेताओं की घर वापसी करवाने का प्रयास करना होगा ? 

उत्तराखंड में भाजपा ने 5 साल में तीसरा मुख्यमंत्री बनाया है इससे पहले ही राजनीतिक पंडित और विश्लेषक उत्तराखंड में भा जा पा की कमजोरी समझे या उत्तराखंड के कद्दावर नेताओं मैं इस बदलाव को लेकर नाराजगी समझे ? राजनीतिक पंडितों को भाजपा के रणनीतिकारों के संकेत को भी समझना होगा ? और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम को भी समझना होगा ?

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश के चुनावों पर अपनी नजर रखेंगे ? क्योंकि राजनीतिक गलियारों में कयास यह लगाया जा रहा था कि उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव की तरह प्रमुख चेहरा नहीं होंगे ? ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी सारी ताकत उत्तराखंड पर लगा कर उत्तर प्रदेश को देखेंगे ? सवाल इसलिए खड़ा होता है क्योंकि तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से हटाकर उत्तराखंड में एक साधारण युवा विधायक  को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया है !

Devendra Yadav
Sr. Journalist


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