राहुल गांधी: संसद में नहीं सड़क पर उतरना होगा, क्या यह समझ गए ?
इन दिनों कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी राजनीतिक गलियारों मैं और मीडिया के भीतर चर्चा का केंद्र बने हुए हैं !
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में राहुल गांधी का ट्रैक्टर पर बैठकर संसद मैं कुच करना हो या फिर पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों का विरोध प्रकट करते हुए साइकल से संसद में जाना हो ! देश की राजधानी दिल्ली मैं एक दलित बेटी के साथ हुए गैंग रेप के पीड़ित परिवार से मिलकर उन्हें ढाढस और न्याय दिलाने का भरोसा दिलाना हो! राहुल गांधी शायद समझ गए हैं कि उन्हें आम जनता के बीच जाना ही होगा ? पिछले 7 सालों पर नजर डालें तो राहुल गांधी जितनी सुर्खियां और चर्चा 7 सालों में नहीं बटोर पाए उससे ज्यादा सुर्खियां और चर्चा उन्होंने 7 दिन में बटोर ली ! राहुल गांधी ने 7 साल में संसद के भीतर जनता की आवाज उठाकर भी देख लिया लेकिन राहुल गांधी को मीडिया और राजनैतिक गलियारों में केवल यह सुनने को मिला की अहम मुद्दों पर राहुल गांधी कहां है कहां है विपक्ष और कहां है कांग्रेस कहां गए राहुल गांधी पिछले 7 साल से राजनीतिक गलियारों में यही शब्द गूंजते हुए दिखाई दे रहे थे मगर अब सड़क से लेकर संसद तक राहुल गांधी कांग्रेस और विपक्ष जनता के लिए संघर्ष करता हुआ नजर आ रहा है !
इतिहास गवाह है 1977 में कांग्रेस की हार के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी सड़क पर आकर संघर्ष किया था जिसका परिणाम यह हुआ कि 1980 में वापस कांग्रेस सत्ता में आई और श्रीमती इंदिरा गांधी देश की फिर से प्रधानमंत्री बनी ! 1998 में इंदिरा जी की तरह श्रीमती सोनिया गांधी भी जनता की आवाज बनकर सड़क पर आई और 2004 में देश की सत्ता मैं कांग्रेस ने वापसी की ! क्या राहुल गांधी को अब यह समझ आ गया है कि जनता की आवाज संसद और सत्ता तक सड़क से ही पहुंच सकति है ! जिस संसद सत्र में कृषि कानून बने थे उस संसद सत्र में सारा विपक्ष मौजूद था, विपक्षी सांसदों के विरोध के बाद भी भाजपा सरकार ने तीन कृषि कानून बिलो को पारित करवाया था, क्या इसे भी राहुल गांधी समझ गए हैं कि संसद के भीतर शोर मचाने से भी कुछ नहीं होगा क्योंकि संख्या में सत्ता पक्ष विपक्ष पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में भारी है ! वर्तमान मानसून सत्र में विपक्ष के शोर-शराबे और हंगामे के बीच भी सरकार ने कई बिल पास करवा लिए ! क्या राहुल गांधी समझ चुके हैं कि जनता की आवाज सड़क पर ही उठानी होगी ! राजनीतिक गलियारों और मीडिया के भीतर यह बात भी सुनाई देती थी कि विपक्ष एकजुट नहीं है राहुल गांधी ने 10 दिन में इस भ्रम को भी तोड़ कर दिखा दिया, एक बार नहीं दो तीन बार ! पेगासस जासूसी प्रकरण को लेकर राहुल गांधी की अगुवाई में सारा विपक्ष एकजुट नजर आया !
राहुल गांधी के राजनीतिक बदलाव और उनके नए राजनीतिक रूप को लेकर भी चर्चा होने लगी है ! लेकिन चर्चा यह नहीं हो रही है कि राहुल गांधी का यह राजनीतिक रूप अचानक से क्यों दिखाई देने लगा है, शायद इसका एक कारण यह है कि अब गांधी परिवार के पास भ्रमित करने वाले रणनीतिकार नहीं है, कांग्रेस आज यदि हाशिए पर है तो इसके पीछे बड़ा हाथ भ्रमित करने वाले रणनीतिकारों का ही है, जिनके कारण कांग्रेस के भीतर जिन लोगों को बड़ी जिम्मेदारी मिलनी चाहिए थी और समय पर मिलनी चाहिए थी वह जिम्मेदारी उन नेताओं को समय रहते नहीं मिल पाई ऐसा नहीं है कि इसके शिकार वह नेता ही हुए हैं जिन्हें बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली बल्कि राहुल गांधी भी उनमें से एक हैं जिन्हें समय रहते हुए जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई, बल्कि रणनीतिकारों ने राहुल गांधी को ऐसी जिम्मेदारी दी जिसके कारण राहुल गांधी आज तक राजनीतिक संघर्ष कर रहे हैं, यदि रणनीतिकार राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश बिहार जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक के रूप में नहीं भेज कर सीधे 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में स्टार प्रचारक बना कर भेजते तो शायद कांग्रेस और राहुल गांधी की तस्वीर ही कुछ और होती ! रणनीतिकारों ने राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनावों में ऐसा प्रचारित किया कि मानो इन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बन जाएगी लेकिन इन राज्यों में कांग्रेस बुरी तरह से हारी और इस हार की जिम्मेदारी भाजपा ने राहुल गांधी को दी और राहुल गांधी के खिलाफ के माहौल बना की जो नेता राज्य नहीं जीता सकता वह देश को कैसे जीता सकता है ? राहुल गांधी के राजनीतिक कैरियर को लेकर कांग्रेस के रणनीतिकारों की यह सबसे बड़ी भूल थी इसे राजनीतिक पंडित या कांग्रेस के नेता माने या ना माने ! इन दिनों उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर भी कुछ ऐसी चर्चा सुनाई दे रही है कि कांग्रेस के रणनीतिकार श्रीमती प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री का चेहरा बना सकते हैं यदि कांग्रेस के रणनीतिकार ऐसा करते हैं तो यह भी राहुल गांधी की तरह एक भूल होगी ! पता नहीं क्यों कांग्रेस के रणनीतिकार एक के बाद एक राष्ट्रीय स्तर के नेता को प्रदेश स्तर के नेता के रूप में सीमित रखना चाहते हैं जबकि सब जानते हैं कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी राष्ट्रीय स्तर के नेता है उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ही उतारना चाहिए !
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Devendra Yadav Sr. Journalist |
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