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Sunday, November 28, 2021

11/28/2021 11:50:00 AM

गहलोत का राजनीतिक दांव कैसे भारी पड़ता है विरोधियों पर ?



●●Devendra Yadav●●

राजस्थान के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत के विरोधी नेता अभी तक अशोक गहलोत के राजनीतिक दांवपेच को नहीं समझ पाए, बल्कि गहलोत विरोधी नेता गहलोत द्वारा बुने गए राजनीतिक जाल में उलझ कर, अपने आप की राजनैतिक हैसियत को कम करते चले गए !

अशोक गहलोत राजस्थान के जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब राजस्थान में कद्दावर नेताओं की एक बड़ी फोज थी, कांग्रेस के भीतर हरिदेव जोशी शिवचरण माथुर हीरालाल देवपुरा और जगन्नाथ पहाड़िया जैसे नेता मौजूद थे जो राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके थे, इनके अलावा पंडित नवल किशोर शर्मा रामनिवास मिर्धा भुवनेश चतुर्वेदी परसराम मदेरणा राजेश पायलट जैसे वह नेता थे जिनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर थी और हाईकमान के बहुत नजदीक थे, कांग्रेस के भीतर ऐसे नेता भी थे जो अशोक गहलोत की तरह प्रदेश और दिल्ली दोनों जगह अपने आप को मजबूत समझते थे, राजेश पायलट गिरजा व्यास यह वह नाम थे जिन पर हाईकमान का हाथ था लेकिन अशोक गहलोत इन सब नेताओं को किनारे कर सबसे पहले विधानसभा के सदस्य नहीं होने के बावजूद राज्य के गृह मंत्री बने  ! अशोक गहलोत ने अपनी राजनीतिक ताकत और हैसियत का एहसास राज्य का गृहमंत्री बनकर अपने विरोधियों को पहली बार दिखाई थी ! बल्कि यूं कहें की गहलोत ने राज्य का गृह मंत्री बनकर राज्य का मुख्यमंत्री बनने की आधारशिला रखी थी ! गहलोत जब राजस्थान के पहली बार मुख्यमंत्री बने तब राजस्थान की राजनीति में खासकर कांग्रेस में, ब्राह्मण और जाट नेता कद्दावर और प्रभावशाली थे, जो मुख्यमंत्री बनने की रेस में सबसे आगे थे, वही हाईकमान से निकटता के रहते राजेश पायलट भी रेस में सबसे आगे थे, इन तमाम नेताओं की मौजूदगी के बावजूद अशोक गहलोत राज्य के मुख्यमंत्री बने, अशोक गहलोत ने पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर एक इतिहास भी बनाया उन्होंने अपने पास एक भी मंत्रालय नहीं रखा ! गहलोत का पहला कार्यकाल राजनीतिक चुनौतियों से भरा था जब कद्दावर नेता खासकर जाट नेता निरंतर मुख्यमंत्री बनने की कोशिश करते हुए दिखाई दिए परसराम मदेरणा पंडित नवल किशोर शर्मा जैसे नेता आस लगाए बैठे रहे की उनका नंबर आएगा लेकिन बड़ी ही राजनीतिक चतुराई से गहलोत ने अपने 5 वर्ष पूरे किए लेकिन 5 वर्ष बाद प्रचंड बहुमत के साथ आई कांग्रेस की सत्ता मात्र 51 सीटें जीतकर तिनके की तरह बिखर गई ! और यहीं से एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा का दौर शुरू हो गया ! कांग्रेस की तरह भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई मगर 5 साल बाद फिर से कांग्रेस सत्ता में आई और अशोक गहलोत ने जोड़ तोड़ कर दूसरी बार सत्ता हासिल की ! इस दरमियान भी कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री बनने के अनेक दावेदार थे जिसमें प्रमुख नाम सीपी जोशी का था जिसके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए  कांग्रेस ने विधानसभा का चुनाव लड़ा था, मगर सीपी जोशी 1 वोट से चुनाव हार गए इसलिए वह मुख्यमंत्री नहीं बन पाए जबकि हाईकमान से जोशी की नज़दीकियों से लगता था की अशोक गहलोत नहीं बल्कि सीपी जोशी मुख्यमंत्री बनेंगे ! दूसरे दौर में भी अशोक गहलोत ने राजनीतिक उठापटक के बावजूद 5 साल पूरे किए और 5 साल बाद कांग्रेस का हर्ष वैसा ही हुआ जैसा पहले हुआ था बल्कि पहले से भी खराब कांग्रेस 30 सीटों का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाई,2018 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस हाईकमान ने सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष बना कर राज्य में सरकार बनाने की जिम्मेदारी दी कांग्रेस की सरकार बनी मगर मुख्यमंत्री सचिन पायलट नहीं बने तीसरी बार अशोक गहलोत राज्य के मुख्यमंत्री बने ! अब सवाल आता है कि अशोक गहलोत अंततः अपने विरोधियों को मात देकर उच्च पद कैसे हासिल कर लेते हैं ? दरअसल गहलोत विरोधी नेता गहलोत की राजनीतिक सोच और राजनीतिक रणनीति को या तो समझ नहीं पाए या फिर वह नेता सक्षम नहीं थे !

जिन क्षेत्रीय नेताओं को गहलोत विरोधी नेता मान कर अपना मान कर अपने कोटे से गहलोत विरोधी नेता विधानसभा का टिकट दिला रहे थे दरअसल वह नेता गहलोत विरोधी थे ही नहीं और ना ही गहलोत विरोधी नेताओं के समर्थक थे वह तो एक रणनीति के तहत विधानसभा का टिकट पाने के लिए गहलोत विरोधी और गहलोत विरोधी नेताओं का समर्थक होने का राजनीतिक नाटक कर रहे थे इसकी झलक सचिन पायलट ने शायद देख भी ली है जिन नेताओं को पायलट ने विधानसभा का टिकट दिलवाया मंत्री बनवाया आज वह नेता किस के पाले में खड़े दिखाई दे रहे हैं ? क्या यह अशोक गहलोत की प्रमुख राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है और इस रणनीति के तहत ही अशोक गहलोत विधानसभा चुनाव के समय टिकट वितरण और सरकार गठन में फायदा उठाते हैं ? 

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