21वी सदी में दलित आंदोलन की विरासत और उसका भविष्य कैसा होगा ?
●●Tikam Shakya●●
21वीं सदी के दूसरे दशक के अंत तक आते-आते दलित आंदोलन के अंत की धारणा प्रबल होती नजर आ रही है। ये धारणा फैल रही है कि दलित आंदोलन अब बिखर चुका है, अंतिम सांसे ले रहा है और इसका भविष्य खतरे में है।
हालांकि उनका इस तरह से सोचना सही भी लगता है क्योंकि वे लोग दलित आंदोलन को और उसके भविष्य को राजनीतिक सफलता में ढूंढ रहे हैं। इस संदर्भ में निश्चित ही दलित आंदोलन राजनीतिक सत्ता से थोड़ी दूर पर खड़ा नजर आ रहा है।
यहां तक कि दलित- पिछड़े और आदिवासी समाज के मुद्दे भी चुनावी घोषणा पत्रों से गायब हो गए हैं। अतः कोई भी व्यक्ति दलित आंदोलन को अगर राजनीतिक सफलता में खोजने या समझने का प्रयास करेगा तो निश्चित ही उसको दलित आंदोलन कमजोर होता और बिखरता नजर आएगा।
परंतु जब दलित आंदोलन की सामाजिक, सांस्कृतिक ,शैक्षणिक क्षेत्रों में खोज की जाती है तो स्थिति विपरीत नजर आती है। दलित आंदोलन को समझना है तो इसकी पड़ताल भारतीय इतिहास में करनी होगी।
इतिहास की जांच पड़ताल करने से पता चलता है कि दलित आंदोलन प्राचीन काल से लेकर अभी तक लगातार जारी है और अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। जैसा कि बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि-
*भारतीय इतिहास क्रांति और प्रति क्रांति के सिवाय और कुछ नहीं है। जिसमें वो बौद्ध धर्म और विचारों की स्थापना क्रांति और उनके खिलाफ ब्राह्मणवादी धर्म और विचारों की स्थापना को प्रतिक्रांति के तौर पर व्याख्यायित करते हैं।*
उपरोक्त संदर्भ में बौद्ध धम्म के विचारों, अंबेडकरवाद तथा शोषण के खिलाफ क्रांति को आज हम दलित आंदोलन के रूप में जानते हैं। इस तरह प्राचीन काल से ही सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पूंजी और संसाधन के अभाव के बावजूद भी दलित आंदोलन अपना संघर्ष लगातार जारी रखे हुए हैं।
हालांकि इसकी गति में तीव्रता और सिथिलता जरूर देखने को मिलती रही है। इसके साथ-साथ इसमें क्षेत्र विशेष और भाषा की भी सीमाएं रही है। परंतु दलित आंदोलन शोषणकारी, अमानवीय, असमानतावादी अर्थात ब्राह्मणवादी शक्तियों और विचारों के खिलाफ प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और आधुनिक काल तक संघर्षरत रहा है।
भगवान बुद्ध से लेकर कबीर, रविदास ,चोखामेला, अयंगकली, फुले दंपत्ति, शाहूजी महाराज, नारायण गुरु, पेरियार रामासामी, बिरसा मुंडा, बाबासाहेब आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह यादव और मान्यवर कांशीराम के संघर्ष और विचार इसके महत्वपूर्ण उदाहरण है।
जिस राजनीतिक सत्ता के आलोक में लोग दलित आंदोलन के अंत की भविष्यवाणी करते हैं। उनको दलित आंदोलन की मजबूती, उसकी व्यापकता और उसकी तीव्रता कुछ महत्वपूर्ण उदाहरणों से समझना चाहिए।
प्रथम, सन् 2019 में 13 प्वाइंट रोस्टर व्यवस्था के खिलाफ संपूर्ण भारत में व्यापक आंदोलन खड़ा हुआ। 13 प्वाइंट रोस्टर व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन की व्यापकता तीव्रता और मजबूती के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा और पूर्व की भांति 200 प्वाइंट रोस्टर व्यवस्था को जारी रखने के लिए मजबूर होना पड़ा।
दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण हुआ है जब अनुसूचित जाति /जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 (SC/ST Act) को कमजोर और निष्प्रभावी बनाने का प्रथम प्रयास किया गया तो इसके खिलाफ भी संपूर्ण भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर आंदोलन हुआ। जिसको लेकर 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद का सफल आंदोलन हुआ। इस आंदोलन की व्यापकता और तीव्रता देखकर सरकार को अपना कदम पीछे लेना पड़ा और संशोधन बिल को वापस लेना पड़ा।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें किसी बड़े नेतृत्व और राजनीतिक दल की भूमिका नहीं थी, और न ही पूर्व नियोजित कोई योजना और तैयारी थी। इन सब के बावजूद इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया और अपने उद्देश्य को प्राप्त किया। यह एक आकस्मिक और प्रतिक्रियावादी आंदोलन था जो विचारधारा और ऊर्जा से लैस था।
तीसरे उदाहरण में हम देखते हैं कि जब नीट( NEET)में पिछड़े वर्ग के आरक्षण को लागू करने के मुद्दे को लेकर सफल आंदोलन हुआ। हालांकि वैश्विक बीमारी के नियमों को पालन करने की वजह से यह आंदोलन जमीन पर नहीं लड़ा गया। अतः आंदोलन करने के दूसरे रास्तों का उपयोग इसमें देखने को मिलता है,जैसे सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, राजनेताओं पर दबाव बनाना इत्यादि।
फिर भी आंदोलन का स्वरूप इतना व्यापक था कि इसमें क्षेत्रीय, भाषायी व जातीय सीमाओं को तोड़ दिया। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने उत्तर भारत और दक्षिण भारत को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। इसके साथ-साथ संपूर्ण भारत और वैश्विक स्तर पर इस को समर्थन मिला।
इस आंदोलन में दलित, पिछड़े, आदिवासी समाज का भी भरपूर समर्थन मिला जिसके कारण इसको और मजबूती मिली। परिणाम यह हुआ कि आंदोलनकारियों की जीत हुई और इस आंदोलन ने अपने उद्देश्य को प्राप्त किया।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दलित आंदोलन अब और ज्यादा व्यापक ,असरदार ,तीव्र और मजबूत हो गया है। दलित, पिछड़े, आदिवासी और धार्मिक अल्पसंख्यक लगभग सभी समाज के लोग मुखर होकर एक दूसरे के आंदोलनों में समर्थन कर रहे हैं और इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर एनआरसी के खिलाफ हो रहे आंदोलन में लगभग सभी शोषित और उपेक्षित समुदाय के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। दूसरे शब्दों में कहें तो दलित आंदोलन अब भाषायी, क्षेत्रीय, धार्मिक, जातीय बंधनों को तोड़ रहा है।
एक तरफ जहां आकस्मिक और प्रतिक्रियावादी आंदोलन लगातार देखने को मिल रहे हैं। वहां दूसरी तरफ रचनात्मक और क्रियावादी आंदोलन भी चल रहे हैं। जो कि लोगों को वैचारिक बनाकर आंदोलन के लिए तैयार कर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर बामसेफ क्रिया कलापों को देखा जा सकता है। बामसेफ भारत में एकमात्र संगठन है जो स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) संगठन को टक्कर देने के लायक है। यह भारत में दलित आंदोलन का रचनात्मक और क्रियावादी आंदोलन चलाने वाला महत्वपूर्ण संगठनों में से एक है। जिसने भारत में शोषित और उपेक्षित समुदाय को अपने अधिकारों के लिए और शोषण के खिलाफ लड़ने की भावना लगातार पैदा कर रहा है।
दूसरे क्रियावादी और रचनात्मक दलित आंदोलन चलाने वाले संगठनों में स्वयं सैनिक दल (एसएसडी) नाम विशेष महत्व रखता है। एसएसडी मूलत: गुजरात प्रदेश में 2006 से शुरू होकर आज पड़ोसी प्रदेशों जैसे राजस्थान महाराष्ट्र में तेजी से अपने आपको स्थापित कर रहा है। एसएसडी संगठन चलाने वालों की माने तो बहुत जल्द संपूर्ण भारत में इनका आंदोलन फैलने का दावा है।
एसएसडी की विशेषता यह है कि इसने अपने सांगठनिक ढांचे को मूर्त रूप नहीं दिया है। इनका मानना है कि शिवाय ढांचा निर्माण हम सब एक समान होकर आंदोलन को आगे बढ़ाएं। क्योंकि संगठन में पद निर्माण से पदाधिकारी लालची और स्वार्थी हो जाते हैं जो आंदोलन के लिए घातक सिद्ध होता है।
हालांकि संगठन के ढांचे न होने के कारण तमाम सीमाएं और समस्याएं भी होती है। परंतु इनका प्रतिदिन आंदोलन चलाने वाली भावना दलित आंदोलन को मजबूती प्रदान करती है।
उपरोक्त क्रियावादी और रचनात्मक आंदोलन की श्रेणी में पसमांदा आंदोलन भी महत्वपूर्ण है, जो मुस्लिम समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों के खिलाफ विमर्श खड़ा कर रहा है। मुस्लिम समाज में जाति आधारित शोषण और बहिष्करण के खिलाफ उग्र हो रहा है।
मुस्लिम समाज के प्रत्येक समुदाय के हक और भागीदारी की पेरोकारी कर रहा है। इस प्रकार जाति व्यवस्था के खिलाफ पसमांदा आंदोलन दूसरे जाति उन्मूलन आंदोलन के करीब नजर आता है। इसी प्रकार दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय में भी जाति विहीन समाज बनाने का कमोवेश प्रयास हो रहा है।
अत: राजनीतिक सफलता के आधार पर दलित आंदोलन को समझने के बजाय अगर हम सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक क्षेत्रों में खोज करें तो पाएंगे कि दलित आंदोलन तमाम अभाओं के बावजूद फल- फूल और पोषित हो रहा है।
जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महापुरुषों के जन्म जयंती, परिनिर्वाण दिवस पर उनके विचारों और आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए तमाम कार्यक्रम किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के गाने अथवा दूसरे कार्यक्रम जो महापुरुषों के विचारों से लैस होता है, मानो बुद्ध, फुले, बिरसा, शाहू जी महाराज और अंबेडकर के विचारों की बाढ़ सी आ गई हो।
इसी प्रकार शिक्षण संस्थानों में दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज से आने वाले शिक्षक और विद्यार्थी आंदोलन और समानतावादी विचार को और महापुरुषों के आदर्शों को मुख्यधारा की वाद- संवाद ,विचार- विमर्श और चर्चा में शामिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस प्रकार की गतिविधि और प्रयास प्रत्येक क्षेत्र में बड़े स्तर पर हो रहा है।
हालांकि संपूर्ण शोषित समाज का इस आंदोलन से जुड़ने की गति थोड़ी धीमी है। परंतु उपरोक्त उदाहरणों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले समय में संपूर्ण शोषित और उपेक्षित समाज बुद्ध, फुले, शाहूजी महाराज, बिरसा और अंबेडकर के आंदोलन में जुड़कर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ शोषणमुक्त और समानतावादी विचारों और व्यवस्था को स्थापित करने की लड़ाई लड़ेगा।
◆ टीकम शाक्य ✍️✍️
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